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Saturday, December 2, 2017

आदत बदलें खेल खेल में

अनुचर     9:39 AM  No comments
अच्छी आदतें डालना और बुरी आदतों से पीछा छुड़ाना बहुत ही मुश्किल काम होता है।



हम सभी मे कोई न कोई ऐसी आदतें होती है जिनसे हम मुक्त होना चाहते हैं। हम जानते हैं की ये आदतें सही नहीं है लेकिन फिर भी ये बुरी आदतें हमसे छूट नहीं पाती है।
इसी प्रकार से कुछ आदतें ऐसी भी होती है जो हम जानते हैं की ये आड़ते बहुत अच्छी है। हम आइस आदतों को अपनाना चाहते हैं। लेकिन अपना नहीं पाते।

इसका सिर्फ एक ही कारण होता है और वो है हमारी कमजोर इच्छा शक्ति

लेकिन मेरी निगाह एक ऐसी वेबसाइट पर पड़ी जो लोगों की आदते बदल रही है। ये वेबसाइट वाकई मे लोगों की आदतें बदल रही है। मैंने इस वेबसाइट की रेंकिंग देखि तो वो भी कमाल की दिखाई दी। काफी सारे लोगों की आदतें ये वेबसाइट बदल चुकी है।

यदि किसी काम को खेल खेल मे किया जाये तो फलीभूत होने लगता है। और यही काम ये वेबसाइट करती है। ये वेबसाइट खेल खेल मे ही लोगों की आदत बदल रही है।
आपको ऐसा लग रहा होगा की मैं इस वेबसाइट का प्रचार कर रहा हूँ। हाँ आप सही समझे मैं वाकई मे इस वेबसाइट का प्रचार ही तो कर रहा हूँ। लेकिन मैं आपको यह भी बताना चाह  रहा हूँ की मैं इस वेबसाइट की किसी भी फाउंडर को या किसी अन्य कर्मी को नहीं जानता हूँ।

मैं इस वेबसाइट के का उपयोग करने की सलाह सिर्फ इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि मैंने स्वयं पर इसे आजमाया... और यह सफल रही।

किसी भी आदत को छुड़ाने या नयी आदत के लिए जबर्दस्त इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है... लेकिन यहाँ आप खेल ही खेल मे अपनी आदतें बदल पाएंगे।

इससे सिर्फ दो महीने के समय मे आप नयी आदत बना पाएंगे और इसके लिए आपको बहुत ही सीमित इच्छा शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा।

चाहें आप रोज दौड़ने की कौशिश कर रहे हों, या पहले से अधिक पुस्तकें पढ्ना चाहते हों, या फिर एक नए कौशल का अभ्यास करना चाहते हों... आप थोड़ी सी इच्छा शक्ति मात्र से ये आदतें बदल पाएंगे। 

यदि आपने कोई विडियो गेम खेला हो तो आप गौर कर पाएंगे की विडियो गेम मे आप चीजों को अच्छी तरह से कर पाते हैं।
विडियो गेम मे एक समय जो कार्य आपके लिए कठिन होते हैं वे धीरे धीरे आसान हो जाते हैं। विडियो गेम मे आपको बार बार वही काम दोहराने पड़ते हैं।  लेकिन फिर भी आप कभी उससे बोर नहीं पाते। विडियो गेम मे आप बार बार दिये गए कार्य को करने के लिए प्रेरित होते रहते हैं।

विडियो गेम बनाने वाले गेम को ऐसे बनाते हैं की उसे खेलने वाले का मोटीवेशन लेवल हमेशा ऊंचा रहता है। उसी प्रकार की यह वेबसाइट Habitica है, यह वेबसाइट गेम बनाने वालों के इस विचार को असली दुनिया मे लायी है।

मैं कई दिनों से इस एप्लिकेशन का उपयोग कर रहा हूँ, और आपको सही बताऊँ तो यह एप्लिकेशन मेरे लिए अब सबसे महत्वपूर्ण एप्लिकेशन बन गयी है।

क्या आप भी आपके जीवन को एक विडियो गेम की तरह बदलना चाहते हैं ?

तो इस विडियो को जरूर देखिये


इस एप्लिकेशन को यहाँ से डाऊनलोड करिये

एप स्टोर का डाऊनलोड लिन्क प्ले स्टोर का डाऊनलोड लिन्क


Wednesday, September 20, 2017

भारत के सबसे महान और गज़ब के अनसुलझे रहस्य

अनुचर     1:15 PM  No comments
हमारे देश मे कुछ ऐसी रहस्यमयी घटनाएँ या रहस्यमयी चीजें है जिनका उत्तर आजतक नहीं मिल सका  । आज जानते हैं  भारत की ऐसी ही दस प्रमुख रहस्यमयी घटनाओं के बारे मे।

ऐसी ही एक घटना । सन 2001 के बीच की बात है दिल्ली मे अलग अलग जगह से मंकी मेन को देखे जाने की खबरें आने लगी जिन जिन लोगों ने इसे देखा उन्होने बताया की बंदर जैसा दिखाई देने वाला एक राक्षस रात को आता है और लोगों पर हमला करता है। कोई कहता था की वह चार फीट का है। किसी ने बताया की वो काले बालों से ढका हुआ है । किसी ने बताया की वो हेलमेट पहनता है । किसी ने बताया की उसकी चमकती हुई लाल लाल आंखे हैं । लेकिन कुछ लोगों का कहना था की वो 8 फीट लंबा, हस्ट पुष्ट शरीर का राक्षस है । किसी ने बताया की वह एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग पर आसानी से कूद जाता है ।

कई लोगों ने अपने आपको मंकी मेन के हमले से घायल होना बताया । उन्होने मंकी पेन के पंजों से होने वाले स्क्रेच दिखाये । कुछ रिपोर्टों के अनुसार तो तीन लोग मारे भी गए।

धीरे धीरे ये घटनाएँ कम होने लगी और एक दिन इन घटनाओं का होना बिलकुल बंद हो गया। मंकी मेन की पहेली आज भी अनसुल्झा रहस्य है

सारी रहस्यमयी घटनाएँ जानने के लिए देखिये ये विडियो



Monday, September 18, 2017

भारत की 10 ऐसी रोचक बातें जो बहुत कम लोग जानते हैं

अनुचर     7:51 AM  No comments
हम दुनिया के सबसे तेज बढ्ने वाली अर्थव्यवस्था हैं

हम प्रगति कर रहे हैं लेकिन आज भी विदेशों मे हमे गरीब देश समझा जाता है

वे सोचते हैं की हमारा देश गरीब है, बीमार हैं, यहाँ वहाँ भिखारी घूमते रहते हैं



आइये जानते हैं की आखिर हम हैं क्या 
सवा सौ करोड़ की आबादी मे से आधे यानि की 50 परसेंट लोग 25 साल के हैं इससे भी बड़ी बात ये हैं की देश के दो तिहाई लोग 35 साल से कम के हैं। इसका एक ही मतलब है की हमारा देश धीरे धीरे ही सही लेकिन मजबूती से युवा शक्ति की ताक़त से विकास कर रहा है। युवा शक्ति के नित नए विचार और निर्णय दुनिया को हमारे देश के प्रति नजरिया बदलने के लिए मजबूर कर रहे हैं ।

एक समय था जब हमारे देश मे एक भी विदेशी निवेशक नहीं आता था। लेकिन आज हमारा देश विदेशी निवेशको के लिए स्वर्ग हैं।
 



हमारा देश कृषि प्रधान देश हैं और हम सब ये जानते हैं की खेती बाड़ी किसी भी प्रकार के टेक्स से मुक्त है, इस पर कोई टेक्स नहीं देना पड़ता है। हमाए देश की आधी से अधिक जनसंख्या गांवों मे निवास करती है और लगभग लगभग उनका एक ही व्यवसाय है , वो है खेतीबाड़ी, इसका एक ही अर्थ है की उनको टेक्स नहीं देना पड़ता ।  

आइये देखते हैं विस्तारपूर्वक ये विडियो 


Thursday, September 14, 2017

आओ याद करते हैं 1990 का वो सुनहरा समय, जब देश बदल रहा था

अनुचर     7:32 AM  No comments
1990 का वो दौर कमाल का था। ये वो समय था जब देश आश्चर्यजनक रूप से बदल रहा था। जितना जबर्दस्त परिवर्तन 1990 से सान 2000 के बीच मे हुआ है उतना कभी नहीं हुआ।
शेयर बाजार हो, या टेलीविज़न हो, बारी मस्जिद का टूटना हो या पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या हो , ऐसी कई गजाब की घटनाएँ इस काल मे भारत मे घट रही थी।
ये वो समय था जब हमारे देश मे नए नए लोग उभर रहे थे, जैसे की सचिन तेंदुलकर, ऐश्वर्या राय, एआर रहमान।  

आइये जानते हैं की 1990 मे हमारे देश मे क्या क्या गज़ब परिवर्तन हुए



Thursday, September 7, 2017

उत्तर कोरिया के घिनोने कानून

अनुचर     2:50 PM  No comments


उत्तर कोरिया एक ऐसा देश है जिसने सारी दुनिया मे तनाव कर रखा है।

उत्तर कोरिया बार बार मिसाइल टेस्ट करता है
लेकिन हालिया हाइड्रोजन बम के परीक्षण से तो सारी दुनिया सकते मे आ गयी है।
खास तौर से अमरीका को उत्तर कोरिया ने जबर्दस्त रूप से परेशान कर रखा है।

नॉर्थ कोरिया एक ऐसा देश है जो गहरे अंधेरे मे छुपा हुआ है, इस देश की ज़्यादातर बातें बाहर नहीं आ पाती। ये देश एक ऐसा देश है जिसकी वजह से आप इशवर को धन्यवाद कर सकते हैं की ईश्वर ने आपको उत्तर कोरिया मे पैदा नहीं किया।

इस देश मे नीली जींस पर पाबंदी है। अगर आप नॉर्थ कोरिया मे हैं। अगर आपने नीली जींस पहन ली। तो समझिए की आपकी शामत आ गयी। 


पूरा विडियो यहाँ देखिये 

  

Tuesday, August 1, 2017

द ब्लू व्हेल गेम - एक खतरनाक खेल

अनुचर     9:31 AM  No comments
यह ऑनलाइन खेल द ब्लू व्हेल गेम या ब्लू व्हेल चेलेंज के नाम से जाना जाता है। इस गेम को रूस के एक व्यक्ति ने बनाया था जो की अभी जेल मे है। यह बहुत ही खतरनाक खेल है। इस गेम के ऊपर आरोप है की इस गेम मे खिलाड़ियों को 50 दिनों मे कुछ टास्क दिये जाते हैं जो की बहुत ही खतरनाक होते हैं। इस गेम मे मिलने वाला अंतिम टास्क अत्महत्या का होता है। 

यह गेम रूस के सोशल नेटवर्क मे मौजूद एक ग्रुप "डेथ ग्रुप" मे आरंभ हुआ। इस गेम के कारण 2015 मे पहली आत्महत्या हुई। फिलिप नामक एक साइकोलोजी के एक छात्र पर इस गेम को बनाने के कारण यूनिवरसिटी ने निकाल दिया। फिलिप का कहना है की वह दुनिया की सफाई कर रहा है, वह उन्हे अत्महत्या के लिए उकसाता है, जिन लोगों की सोसाइटी मे कोई महत्व नहीं है।


16 लोगों ने इस गेम की वजह से आत्महत्या कर ली। फिलिप को इस गेम को बनाने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया।

इस गेम मे एडमिनिस्ट्रेटर द्वारा खिलाड़ियोंकों चेलेंज दिये जाते हैं जिनहे खिलाड़ियों कों पूरा करना ही होता है। शुरुआती छोटे छोटे चेलेंज के बाद प्रतिदिन खतरनाक चेलेंज दिये जाने लगते हैं, जैसे की सुबह 4 बजकर 20 मिनट पर जागना, क्रेन पर चडना, हाथ या पैर मे सुई घुसाना, छट या पूल पर खड़ा होना, संगीत सुनना, एडमिन द्वारा भेजे गए विडियो देखना। लेकिन अंतिम टास्क स्वयं को समाप्त करने की होती है।

जुलाई 2017 मे भारत मे भी एक किशोर ने इस गेम की वजह से अत्महत्या कर ली।

मेरा ये पोस्ट लिखने का सिर्फ यही उद्देश्य है की माता-पिता को अपने बच्चों पर निगाह रखनी चाहिए, माता पिता को ध्यान रखना चाहिए की उनका बच्चा मोबाइल मे कौनसा गेम खेल रहा है। आजकल फोन सिर्फ बात करने के लिए ही नहीं है, बल्कि मे बहुत खतरनाक हो चुके हैं। 

और बच्चों से भी सलाह है की वे रचनात्मक गेम खेलें, दुनिया के लिए कुछ करना है, अपने घर परिवार का, अपने शहर का, अपने देश का नाम चमकाना है। सेना मे जाना है, डॉ बनना है, इंजीनियर बनना है, रेडियो जोकि बनना है, CA बनना है। 
ज़िंदगी बहुत बड़ी होती है, इसे आनंद के साथ गुजरना चाहिए। 




(“Big mama (Blue whale) 2012” by Gwenn Seemel is licensed under CC BY 2.0)

Friday, July 1, 2016

घर पर ही बनाए सस्ती और क्वालिटी बियर

अनुचर     10:37 AM  2 comments
जी हाँ बीयर का किट मंगवाकर घर ही अच्छी बियर बनाई जा सकती है जो की दाम मे भी बहुत कम पड़ती है। ऑनलाइन कंपनी amezon पर बीयर बनाने के कई प्रकार के किट मौजूद हैं। जैसे की MR BEER, The Beer Machine इत्यादि। ये किट 4 से 6 हजार तक के दाम मे मिल जाते हैं। इन किट्स के साथ बीयर बनाने के सामाग्री और और बीयर की खाली बोटल्स भी आती है।
बीयर बनाने की सामग्री के लिए अलग भुगतान करना पड़ता है। बीयर बनाने की सामग्री मे माल्ट एक्स्ट्रेक्ट, ब्रूइंग यीस्ट आता है। ये कई प्रकार की बीयर के लिए अलग अलग आते हैं।

 
बीयर को कार्बोनेट करने के लिए कार्बोनेट ड्रोप्स आती है।

इस किट का कैसे उपयोग करें इसके लिए यू ट्यूब पर सैंकड़ों वीडियोज़ मौजूद हैं। जिसे देखकर आसानी से घर पर बीयर बनाई जा सकती है।
अब यहाँ प्रश्न उठता है की क्या भारत मे घर पर बीयर बनाना गैर कानूनी तो नहीं तो इसका जवाब है नहीं। आप घर पर केवल उन राज्यों मे जहां पर मदिरा को बेन नहीं किया गया हो बीयर बना सकते हैं। लेकिन  बीयर को बेच नहीं सकते, सिर्फ स्वयं के उपयोग के लिए ही बना सकते हैं।





Saturday, April 23, 2016

टिवीटर पर बॉबी देओल के पेरोडी अकाउंट के लोटपोट कर देने ट्वीट्स

अनुचर     3:04 PM  No comments



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Tuesday, March 15, 2016

बासमती चावल क्या है

अनुचर     11:15 AM  No comments
बासमती चावल चावल की सबसे अच्छी किस्म है। बासमती चावल दुनिया भर मे अपनी विशिष्ट खुशबू एवं स्वाद मे प्रसिद्ध है। "बासमती" मे 'बास' का अर्थ गंध होता है अर्थात खुशबू वाला चावल। इसका अन्य अर्थ कोमल या मुलायम चावल भी होता है। 

बासमती चावक का दाना दुनिया भर मे अपनी अत्यधिक लंबाई और खुशबू के लिए जाना जाता है। इसकी न केवल राष्ट्रीय, वरन अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी अत्यधिक मांग है। भारत अरबों डॉलर का बासमती चावल निर्यात करता है। भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। उसके बाद पाकिस्तान, नेपाल और बांग्ला देश मे इसकी खेती होती है। 

बासमती चावल का पारंपरिक पौधा अपेक्षाकृत लंबा और पतला होता है, ये पौधा तेज हवा को सह नहीं पाता है इस कारण अन्य चावल की क़िस्मों की अपेक्षा बासमती मे थोड़ी कम पैदावार होती है लेकिन जितनी भी होती है उच्च श्रेणी की होती है। यह भारत और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही बाज़ारों मे ऊंचे दामो पर बिकता है। 



बासमती च्वल सफ़ेद या भूरे रंग का होता है। इसमे एक खास स्वाद होता है जो की पेंडन का स्वाद कहा जाता है। बासमती की भी कई तरह की किसमे होती है। जैसे की बासमती370, बासमती 385, बासमती रणबीरसिंघ पूरा(आरएस पूरा) और संकर यानि की हाइब्रिड किस्मों मे पूस बासमती1 जिसे टोडल भी कहते हैं। लेकिन ये हाइब्रिड किसमे बासमती के स्टॉक से ही बनाई जाती है। इन्हे शुद्ध नहीं माना जाता। 

विशुद्ध बासमती चावल की खेती समतली मैदानो मे की जाती है। 

बिरयानी बनाने मे बासमती चावल का ही उपयोग किया जाता है। इन चावलों को पकाने के बाद ये चावल पककर लेसदार नहीं होता। बल्कि मे ये चावल खिला खिला और चिपचिपाहट रहित होता है। 

बासमती चावल के पेटेंट को लेकर भी खूब विवाद हुआ। इसका पेटेंट अमरीका की एक संस्था ने करा लिया था। जिस पर राजनयिक स्तर पर विवाद बढ़ गया था। लेकिन बाद मे भारत ये युद्ध जीत गया नहीं तो यहाँ के किसानो को बहुत घाटा होता। अब भारत सरकार ने इसपर से निर्यात कर भी हटा दिया है। 

बासमती के जीआई को लेकर जबर्दस्त भी विवाद चल रहा था। लेकिन अब भारतीय बासमती चावल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान मिल गयी है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान ने स्वीकार किया है कि बासमती चावल का उत्पादन गंगा के मैदानी इलाकों में होता है। बासमती चावल के निर्यात से भारत को सालाना 29,000 करोड़ रुपये की आय होती है। यह पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब और भारत के 77 जिलों में उगाया जाता है। भौगोलिक पहचान यानी जीआइ टैग से तात्पर्य उन इलाकों को चिह्नित करने से है, जहां बासमती की परंपरागत तौर पर खेती होती रही है। यहां के चावल की खुशबू और चावल की लंबाई अपने आप में अनोखी तो होती ही है, चावल का स्वाद भी अनूठा होता है। इसका ट्रेडमार्क और पेटेंट किया जाता है। चेन्नई स्थित बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आइपीएबी) ने हाल में बासमती चावल से संबंधित सभी पक्षकारों की दलीलों की सुनवाई पूरी कर ली है। इसमें किसान, निर्यातक, बीजों की किस्म तैयार करने वाले कृषि वैज्ञानिक और पाकिस्तान के प्रतिनिधि प्रमुख हैं। 


Monday, February 29, 2016

जल्द ही बदलने वाला है Chokanna.com

अनुचर     10:51 AM  No comments
आपका चोकन्ना डॉट कॉम जल्द ही बदलने वाला है। अभी तक एक ऑनलाइन अखबार की तरह चलने वाला चौकन्ना अब मेगज़ीन बनाया जाएगा। मेगज़ीन को अत्यधिक मनोरंजक बनाने और नीत नयी सामग्री डालने के लिए विशेष प्रयास किए जाएँगे।
चौकन्ना डॉट कॉम को व्यावसायिक रूप से अत्यधिक शानदार रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन धन के अभाव के कारण इसमे समय लग रहा है। लेकिन फिर इस कारी को समय से पूर्व कर लिया जाएगा। और फिर आपका चौकन्ना एक मनोरंजक पत्रिका के रूप मे आपके सामने होगा। 

Sunday, January 10, 2016

सिर्फ एक लडकी के स्कूल आने जाने के लिए चलती है ट्रेन

अनुचर     8:56 AM  No comments
कामी-शीरताकी रेलवे स्टेशन पर कई सालों से सिर्फ एक यात्री ट्रेन का इंतजार करता है। सिर्फ इसी यात्री को लेने ट्रेन आती है और इसी यात्री को वापस लाती है। जिस दिन इस यात्री को नहीं जाना होता उस दिन ये ट्रेन नहीं चलती। 
जापान की सरकार देश के हर नागरिक पूरा ख्याल रखती है। ताजा मिसाल वहां के एक गांव की है। यहां सिर्फ एक लड़की के लिए जापान सरकार ट्रेन चला रही है। ताकि वह घर से स्कूल आ-जा सके। ट्रेन का शेड्यूल भी लड़की के स्कूल की टाइमिंग पर ही रखा गया है। यानि जिस दिन स्कूल में छुट्‌टी होती है उस दिन ये ट्रेन भी नहीं चलती है। 
ट्रेन का इंतजार करती लड़की

यह हकीकत है, जापान के उत्तरी द्वीप पर स्थित होकाइदो की। यहां के कामी शिराताकी गांव के रेलवे स्टेशन को तीन साल पहले सरकार ने बंद करने का फैसला किया था। इसके लिए नोटिस भी जारी कर दिया। क्योंकि यहां यात्रियों की संख्या बहुत कम हो गई थी। दरअसल, कामी शिराताकी गांव के आसपास अधिक जनसंख्या नहीं रहती है। लेकिन रेलवे अधिकारियों को जब मालूम चला कि गांव से रोजाना हाईस्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की स्कूल जाती है। उसके स्कूल तक पहुंचने के लिए और कोई साधन नहीं है। तो उन्होंने रेल मंत्रालय को इसकी सूचना दी। फौरन सरकार ने लड़की के लिए ट्रेन को दोबारा शुरू करने का आदेश दिया। सरकार ने लड़की के ग्रेजुएशन पास होने तक ट्रेन को चलाने को कहा। इसके बाद से यह ट्रेन रोजाना लड़की को लेकर स्कूल जाती है। और दोबारा स्कूल से गांव पहुंचाती है। यह स्टेशन इस साल मार्च में बंद हो जाएगा। क्योंकि लड़की का ग्रेजुएशन की मार्च में पूरी हो जाएगा। 
यह खबर सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गई है। लोग जापान सरकार के इस फैसले का काफी सराह रहे हैं। एक व्यक्ति ने फेसबुक पर कमेंट किया "क्यों हम उस देश के लिए मरना पसंद करें जो मेरे लिए इतना कुछ करती है।' एक अन्य ने लिखा कि "यह वास्तविक गुड गवर्नेंस है। जिसके लिए हर एक नागरिक महत्व रखता है।' 

Thursday, December 10, 2015

हीरोइन ऑफ हाईजैक - नीरजा भनोट

अनुचर     9:37 AM  No comments
मुम्बई से न्यूयॉर्क के लिये रवाना पैन ऍम-73 को कराची में चार आतंकवादियों ने अपहृत कर लिया और सारे यात्रियों को बंधक बना लिया। नीरजा उस विमान में सीनियर पर्सर के रूप में नियुक्त थीं और उन्हीं की तत्काल सूचना पर चालक दल के तीन सदस्य विमान के कॉकपिट से तुरंत सुरक्षित निकलने में कामयाब हो गये। पीछे रह गयी सबसे वरिष्ठ विमानकर्मी के रूप में यात्रियों की जिम्मेवारी नीरजा के ऊपर थी और जब १७ घंटों के बाद आतंकवादियों ने यात्रियों की हत्या शुरू कर दी और विमान में विस्फोटक लगाने शुरू किये तो नीरजा विमान का इमरजेंसी दरवाजा खोलने में कामयाब हुईं और यात्रियों को सुरक्षित निकलने का रास्ता मुहैय्या कराया।

वे चाहतीं तो दरवाजा खोलते ही खुद पहले कूदकर निकल सकती थीं किन्तु उन्होंने ऐसा न करके पहले यात्रियों को निकलने का प्रयास किया। इसी प्रयास में तीन बच्चों को निकालते हुए जब एक आतंकवादी ने बच्चों पर गोली चलानी चाही नीरजा के बीच में आकार मुकाबला करते वक्त उस आतंकवादी की गोलियों की बौछार से नीरजा की मृत्यु हुई। नीरजा के इस वीरतापूर्ण आत्मोत्सर्ग ने उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूरियत दिलाई।

नीरजा का जन्म ७ सितंबर १९६३ को पिता हरीश भनोट और माँ रमा भनोट की पुत्री के रूप में चंडीगढ़ में हुआ। उनके पिता बंबई (अब मुंबई) में पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत थे और नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ के सैक्रेड हार्ट सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में हुई। इसके पश्चात् उनकी शिक्षा मुम्बई के स्कोटिश स्कूल और सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में हुई।

नीरजा का विवाह वर्ष १९८५ में संपन्न हुआ और वे पति के साथ खाड़ी देश को चली गयीं लेकिन कुछ दिनों बाद दहेज के दबाव को लेकर इस रिश्ते में खटास आयी और विवाह के दो महीने बाद ही नीरजा वापस मुंबई आ गयीं। इसके बाद उन्होंने पैन ऍम में विमान परिचारिका की नौकरी के लिये आवेदन किया और चुने जाने के बाद मियामी में ट्रेनिंग के बाद वापस लौटीं।

नीरजा को भारत सरकार ने इस अदभुत वीरता और साहस के लिए मरणोंपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया जो भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है।अपनी वीरगति के समय नीरजा भनोट की उम्र २३ साल थी। इस प्रकार वे यह पदक प्राप्त करने वाली पहली महिला और सबसे कम आयु की नागरिक भी बन गईं। पाकिस्तान सरकार की ओर से उन्हें तमगा-ए-इन्सानियत से नवाज़ा गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के तौर पर मशहूर है। वर्ष २००४ में उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया और अमेरिका ने वर्ष २००५ में उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया है।
नीरजा की समृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया जिसका उद्घाटन ९० के दशक में अमिताभ बच्चन ने किया। इसके अलावा उनकी स्मृति में एक संस्था नीरजा भनोट पैन ऍम न्यास की स्थापना भी हुई है जो उनकी वीरता को स्मरण करते हुए महिलाओं को अदम्य साहस और वीरता हेतु पुरस्कृत करती है। उनके परिजनों द्वारा स्थापित यह संस्था प्रतिवर्ष दो पुरस्कार प्रदान करती है जिनमें से एक विमान कर्मचारियों को वैश्विक स्तर पर प्रदान किया जाता है और दूसरा भारत में महिलाओं को विभिन्न प्रकार के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने और संघर्ष के लिये। प्रत्येक पुरास्कार की धन्राषित १,५०,००० रुपये है और इसके साथ पुरस्कृत महिला को एक ट्रोफी और स्मृतिपत्र दिया जाता है। महिला अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिये प्रसिद्द हुई राजस्थान की दलित महिला भंवरीबाई को भी यह पुरस्कार दिया गया था।
नीरजा के इस साहसिक कार्य और उनके बलिदान को याद रखने के लिये उन पर फ़िल्म निर्माण की घोषणा वर्ष २०१० में ही हो गयी थी परन्तु किन्हीं कारणों से यह कार्य टलता रहा। अप्रैल २०१५ में यह खबर आयी कि राम माधवानी के निर्देशन में इस फ़िल्म की शूटिंग शुरू हुई है। इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर अदा करेंगी। फ़िल्म के इसे इसी वर्ष के अंत तक या २०१६ में रिलीज होने कि संभावना है। इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर अतुल काशबेकर हैं।

Wednesday, December 9, 2015

जनता पार्टी भी अंततः कांग्रेस हो जाएगी

अनुचर     12:22 PM  No comments
कांग्रेस का राज 30 साल पहले कैसा था और आज कैसा है इसका अंदाज़ा आपको देश के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार स्व. शरद जोशी के इस व्यंग्य लेख से हो जाएगा-ये लेख स्व. जोशी ने 36 साल पहले वर्ष 1977 में लिखा था।
कांग्रेस को राज करते करते तीस साल बीत गए । कुछ कहते हैं, तीन सौ साल बीत गए । गलत है ।सिर्फ तीस साल बीते । इन तीस सालों में कभी देश आगे बढ़ा , कभी कांग्रेस आगे बढ़ी । कभी दोनों आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए। फिर यों हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई। तीस सालों की यह यात्रा कांग्रेस की महायात्रा है। वह खादी भंडार से आरम्भ हुई और सचिवालय पर समाप्त हो गई।
पूरे तीस साल तक कांग्रेस हमारे देश पर तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही, बर्फ सी जमी रही। पूरे तीस साल तक कांग्रेस ने देश में इतिहास बनाया, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा और विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा। पोस्टरों, किताबों ,सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह है कि देश के जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा रहा। रेडियो, टीवी डाक्यूमेंट्री, सरकारी बैठकों और सम्मेलनों में, गरज यह कि दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूँज थी और वह कांग्रेस की थी। कांग्रेस हमारी आदत बन गई। कभी न छूटने वाली बुरी आदत। हम सब यहाँ वहां से दिल दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे। इन तीस सालों में हर भारतवासी के अंतर में कांग्रेस गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समा गई।

जैसे ही आजादी मिली कांग्रेस ने यह महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुरदुरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है। इसलिए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाए, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए। अंग्रेजों की जेल में कांग्रेसी के साथ बहुत अत्याचार हुआ था। उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था। अगर आजादी के बाद अच्छी क्वालिटी की कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे-तकिये भरे गए। और कांग्रेसी उस पर विराज कर, टिक कर देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे। देश में समस्याएँ बहुत थीं, कांग्रेसी भी बहुत थे।समस्याएँ बढ़ रही थीं, कांग्रेस भी बढ़ रही थी।

एक दिन ऐसा आया की समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई। दोनों बढ़ने लगे। पूरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है? खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाया कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा। जो दाएं नहीं है वह कांग्रेस है।जो बाएँ नहीं है वह कांग्रेस है। जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है। जो मध्य से बाएँ है वह कांग्रेस है। मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है। कांग्रेस सर्वत्र है। हर कुर्सी पर है। हर कुर्सी के पीछे है। हर कुर्सी के सामने खड़ी है। हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है है। इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस तीस साल तक अचल खड़ी हिलती रही।

तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा। जो कहा वो किया नहीं, जो किया वो बताया नहीं,जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था। अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से। सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही। पेड़ लगाने का आन्दोलन चलाया और ठेके देकर जंगल के जंगल साफ़ कर दिए। राहत दी मगर टैक्स बढ़ा दिए। शराब के ठेके दिए,  दारु के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही।

हिंदी की हिमायती रही अंग्रेजी को चालू रखा। योजना बनायी तो लागू नहीं होने दी। लागू की तो रोक दिया। रोक दिया तो चालू नहीं की। समस्याएं उठी तो कमीशन बैठे, रिपोर्ट आई तो पढ़ा नहीं। कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास है। समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को शिकायत का मौका नहीं दिया। नारा दिया तो पूरा नहीं किया। प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया, पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को। दोनों के बीच खुद खड़ी हो गई । तीस साल तक खड़ी रही।

एक को बढ़ने नहीं दिया।दूसरे को घटने नहीं दिया। आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद मांगते रहे। 'यूथ' को बढ़ावा दिया, बुड्द्धों को टिकेट दिया। जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया। जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे उसे केंद्र में ले आए। जो दोनों जगह बेकार थे उसे एम्बेसेडर बना दिया। वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा। एकता पर जोर दिया आपस में लड़ाते रहे। जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा। प्रार्थनाएं सुनीं और भूल गए। आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं। जिन्हें निभाया वे आश्वश्त नहीं हुए। मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे। जनता की सुनते रहे अफसर की मानते रहे।शांति की अपील की, भाषण देते रहे। खुद कुछ किया नहीं दूसरे का होने नहीं दिया। संतुलन की इन्तहा यह हुई कि उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे। दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए।

तीस साल तक पूरे, पूरे तीस साल तक, कांग्रेस एक सरकार नहीं, एक संतुलन का नाम था। संतुलन, तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही बर्फ सी जमी रही पूरे तीस साल तक। कांग्रेस अमर है। वह मर नहीं सकती। उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएँगे। जब तक पक्षपात ,निर्णयहीनता ढीलापन, दोमुंहापन, पूर्वाग्रह, ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता। कांग्रेस कायम रहेगी। दाएं, बाएँ, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी। इस देश में जो भी होता है अंततः कांग्रेस होता है। जनता पार्टी भी अंततः कांग्रेस हो जाएगी। जो कुछ होना है उसे आखिर में कांग्रेस होना है। तीस नहीं तीन सौ साल बीत जाएँगे, कांग्रेस इस देश का पीछा नहीं छोड़ने वाली।।।

Thursday, November 19, 2015

आईएस के संपर्क में हैं भारत के 150 युवक

अनुचर     9:52 AM  No comments
कुख्यात आतंकी संगठन आईएसआईएस की तरफ झुकाव रखने वाले देश के 150 युवकों पर खुफिया एजेंसियों की पैनी नजर है।खुफिया एजेंसियों की तरफ से तैयार की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि 150 युवक निगरानी में है और ज्यादातर दक्षिण भारत के हैं।
अब तक कुल 23 भारतीय आईएस की पकड़ वाले इराक-सीरिया में इस आतंकी संगठन की लड़ाई में शामिल होने जा चुके हैं। इनमें से 6 मारे गए और एक वापस मुंबई आ गया है। खुफिया एजेंसियोंं के मुताबिक इनमें से ज्यादातर लोग आईएस की गतिविधियों से ऑनलाइन रेग्युलर संपर्क में रहते हैं। इस लिहाज में हमने सभी को सुरक्षा बलों के जरिए निगरानी में रखा है। 

आतंकवादी संगठनों से लड़ने के लिए अब तक कुल 23 भारतीय इराक-सीरिया में आईएसआईएस के कब्जे वाले इलाकों में गए हैं। उनमें से छह मारे गए जबकि एक मुंबई स्थित अपने घर लौट आया।

आईएसआईएस तत्वों ने जिन 30 अन्य भारतीयों को कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाया है उन्हें भी मध्य पूर्व के संघर्ष वाले क्षेत्रों में जाने से रोक दिया गया है। 

आईएसआईएस से फिलहाल लड़ने वालों में मुंबई के बाहरी इलाके कल्याण से दो युवक, ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला एक कश्मीरी, तेलंगाना से एक लड़का, एक कर्नाटक से, एक ओमान आधारित भारतीय और एक सिंगापुर आधारित भारतीय शामिल है।


यूएई ने इसी माह 37 साल की एक महिला आफ्शा जबीन उर्फ निक्की जोसेफ को भी वापस भेज दिया था। इस महिला पर आरोप है कि वह आईएस के लिए युवाओं को भर्ती करने का काम संभालती है।

गृहमंत्रालय ने कहा  कि आईएस भारत में अपनी मौजूदगी स्थापित करने में सक्षम नहीं है लेकिन वह युवाओं को प्रभावित कर अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। मंत्रालय ने कहा कि प्रवासी भारतीयों और कुछ खास सेक्शन की स्थानीय आबादी को यह संगठन अपनी गतिविधियों में शामिल करने में लगा है। गृहमंत्रालय ने आशंका जताई है कि आईएस भारत में प्रायोजित आतंकी हमले को अंजाम दिला सकता है।

Thursday, October 29, 2015

देश को चाहिए असली उदारवादी - चेतन भगत

अनुचर     8:36 AM  No comments
यदि आप सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय मुद्दों और राजनीति पर चल रही बहस पर निगाह रख रहे हैं तो दो विशिष्ट खेमें आपको नज़र आए होंगे। एक है ‘दक्षिणपंथी’ खेमा। ये खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं। इनके हिंदुत्व के प्रति प्रेम और भाजपा, मोदी व आरएसएस ( कालबाह्य हो चुकी चड्‌डी इसकी वर्दी में शामिल है) के प्रति समर्थन को देखते हुए इन्हें उपहासपूर्वक ‘भक्त,’ ‘संघी’ और ‘चड्‌डी वाला’ कहा जाता है। ये लैबल देने वाले दूसरे खेमे से हैं। इनके पास खुद को वर्णित करने के लिए नायाब शब्दावली है। खुद को उदारवादी कहते हैं। ‘उदारवादी’ शब्द में ही सुकून देने वाली छटा है। ऐसा लगता है जैसे कुछ बुद्धिजीवी चाय की चुस्कियों के साथ गहरी बौद्धिक दलीलें रख रहे हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रवादी सुनकर लगता है जैसे ये गलियों के उन्मादी, छाती कूटने वाले आंदोलनकारी हों। मैं आपको बताता हूं कि उदारवादी कौन हैं, क्योंकि वे वामपंथी नहीं हैं। न तो आर्थिक नीति और न धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों पर हमारे प्रिय उदारवादियों को पता होता है कि भारत वास्तव में कैसा होना चाहिए। और न उनके पास कभी कोई समाधान होता है, इसलिए यह कहना कठिन है कि वे किस बात का प्रतिनिधित्व करते हैं। चाहे वे आज़ाद खयाल बुद्धिजीवी होने का दावा कर रहे हों, लेकिन उनका व्यवहार झुंड की तरह होता है। तो ये हैं कौन? ये उदारवादी ऐसे लोग हैं, जो विशिष्ट वर्ग में पले-बढ़े, जिसके कारण उन्हें अन्यों की तुलना में ऊंचा दर्जा मिला। इस वर्ग का संबंध धन से ही नहीं है बल्कि अंग्रेजी माध्यम में मिली शिक्षा के ऊंचे स्तर और विश्व संस्कृति से उनके परिचय से भी आता है। याद करें स्कूल के दिनों के उन बच्चों को, जो टिफिन मे हॉटडॉग लेकर आते थे, जबकि आपको पता ही नहीं था कि हॉटडॉग होता क्या है? या वह बच्चा याद है, जो ब्रिटिश काउंसिल लाइब्रेरी की अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ता था, जिसके परिवार के पास लाइब्रेरी की सदस्यता होती थी। आपका परिवार तो हिंदी टीवी सीरियल से आगे नहीं जा पाता था? डिज़्नीलैंड जाकर आया साथी याद है, जबकि आप अप्पू घर जाने (वह भी तब जब आप दिल्ली में रहते हों) के लिए अगले जन्मदिन का इंतजार करते थे। ये बच्चे बड़े हुए और इन्हें इस सब का बड़ा फायदा मिला। वे शेष भारतीयों से कुछ विशिष्ट थे। उनके बेहतर संपर्क थे, वे बेहतरीन अंग्रेजी बोलते थे और अंतरराष्ट्रीय संस्कृति के अनुभव के कारण वे उच्च वर्ग के साथ घुलमिल सकते थे। आम आदमी से विशिष्ट होने से उन्हें सर्वश्रेष्ठ नौकरियां मिलतीं और इससे भी बड़ी बात, समाज में ऊंचा दर्जा मिलता। विशिष्ट वर्ग के ये बच्चे अपने जैसे अन्य बच्चों को आसानी से पहचान लेते और वे एक-दूसरे के साथ रहना पसंद करते। चूंकि खुद को अलग साबित करना उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्होंने लगभग हर उस चीज को नापसंद करना शुरू कर दिया, जिसे साधारण भारतीय पसंद करते। देशी भाषाएं निम्न वर्ग का लक्षण था। गुजराती या बिहारी लहजे में कोई अंग्रेजी बोलता तो उसकी खिल्ली उड़ाई जाती (कोई इटालियन या फ्रेंच लहजे में अंग्रेजी बोले तो उसे अनोखा समझा जाता)। हिंदू धर्म को पिछड़ा धर्म समझा जाता। चूंकि भारतीयों के दिमाग में ही जाति व्यवस्था जमी हुई है, विशिष्ट वर्ग के इन बच्चों ने भी अपना अलग वर्ग बना लिया।
चूंकि खुद को अलग साबित करना उदारवादियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, उन्होंने लगभग हर उस चीज को नापसंद करना शुरू कर दिया, जिसे साधारण भारतीय पसंद करते। देशी भाषाएं निम्न वर्ग का लक्षण थीं।
खेद है कि वक्त के साथ भारत आर्थिक प्रगति करता गया। प्रतिभा की मांग बढ़ गई और अब विशिष्ट वर्ग के होेने का उतना अर्थ नहीं रहा। योग्यता व प्रतिभा के आधार पर नौकरियां हासिल हुईं तो ज्यादा लोगों के पास पैसा आया। फिर शायद उन्हें वैश्विक संस्कृति का वैसा अनुभव नहीं था जैसा विशिष्ट वर्ग के बच्चों को था। इसके साथ प्रतिभाशाली बच्चों को स्थानीय संस्कृति,भाषा और धर्म को निची निगाह से देखने की कोई जरूरत नहीं थी। इन्होंने गौरवभरे राष्ट्रवादियों का बड़ा वर्ग तैयार किया- आर्थिक वृद्धि चाहने वाला, हर भारतीय चीज पर गर्व करने वाला और शायद वे वैश्विक संस्कृति से उतने वाकिफ भी नहीं थे। इस बीच विशिष्ट वर्ग के बच्चे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे। वे एकजुट होकर उदारवादियों के नए ब्रांड के रूप में उभरे। खुद को धर्मनिरपेक्ष, सर्वसमावेशी, सहिष्णु कहने लगे। दावा करने लगे कि वे भारत को हिंदू आक्रमण से बचा रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू धृष्टता पर हमला करने वाले ये उदारवादी, उसी तरह इस्लामी कट्‌टरपंथियों पर हमला नहीं करते। आधुनिक व निष्पक्ष होने का दावा करने वाले इन लोगों को शायद ही कभी लैंगिक समानता के सिद्धांतों के विरोधी इस्लामी फतवों के खिलाफ बोलते पाया जाता है। मसलन, गोधरा दंगों पर उदारवादी चर्चा इस बहस से कहीं ज्यादा हुई कि निर्दोष तीर्थयात्रियों से भरी ट्रेन को आग लगाकर और शहर के बीच में बम विस्फोट कर इस्लामी कट्‌टरपंथी बच कैसे निकले। इन उदारवादियों को उपहास में छद्म धर्मनिरपेक्षवादी और छद्म उदारवादी इसलिए कहते हैं कि उदारवाद उनका एजेंडा है ही नहीं। उनका एजेंडा तो उन वर्गों को निची निगाह से देखना है, जिन्हें दुनियाभर के देशों में घुमने-फिरने के अनुभव की विशिष्टता हासिल नहीं है। मसलन, यदि मोदी और अमित शाह पढ़ने के लिए दून स्कूल गए होते या विदेशी कॉलेज में पढ़े होते या कम से कम शानदार अंग्रेजी बोल पाते तो उदारवादी उनके प्रति काफी उदारता दिखाते। दुख तो यह है कि हमें असली उदारवादियों व बुद्धिजीवियों की सख्त जरूरत है। हमें ऐसे लोग चाहिए, जिनके पास नए विचार हों, समाधान हों और सच्चे अर्थ में सबमें मिलने-जुलने की इच्छा हो। इसकी बजाय हमारे सामने कुलीनतावादियों का ऐसा वर्ग है, जो अपनी बेमिसाल अंग्रेजी से जमीन बचाए हुए है, जबकि न तो उसके पास कोई समाधान है और न अपनी विशिष्टता साझा करने की इच्छा। मोदी से नफरत करने या अन्य वर्गों व उनकी इच्छा-आकांक्षाओं को नीची निगाह से देखने से कुछ नहीं होगा। इसकी बजाय ऐसे समाधान लाएं कि भारतीय समाज सच्चे अर्थों में बदल सके। यदि आप सच में उदारवादी और बुद्धिजीवी बनना चाहते हैं, तो उंगलियां उठाना छोड़ें और हर बात को कांग्रेस बनाम भाजपा का खेल न बनाएं। एेसे समाधान लाइए, जिन्हें समाज में लागू करने की जरूरत है- फिर चाहे समान नागरिक संहिता हो, जो किसी भी धर्म से ऊपर है, आर्थिक सुधार का साझा एजेंडा हो, सबके लिए अंग्रेजी या हर व्यक्ति के लिए शिक्षा सुविधाओं में सुधार की बात ही क्यों न हो। इसके लिए नेताओं पर निर्भर मत रहिए, क्योंकि उन्हें अपना पद बचाना है और इसीलिए वोट बैंक की पहले रक्षा करनी है। समाज में सुधार के लिए आम-सहमति तो बुद्धिजीवी और उदारवादी कायम कर सकते हैं। फिर तो नेता भी इसका अनुसरण करेंगे। उदारवादी होना चाहते हैं तो समाधान की ओर देखिए, सच्चे खुले दिमाग वाले व्यक्ति बनें, कुलीनतावाद से रहित। चीनी मिट्‌टी के शानदार कप से चाय की चुस्कियां लेना पूरी अपनी पसंद की बात है और बेशक, इसमें कोई हर्ज नहीं है।

{लेखक को ई मेल करने के लिए chetan.bhagat@gmail.com पर मेल करें}

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